नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

क्या आप जरूरत से ज्यादा सोते हैं? Oversleeping बन सकती है इन गंभीर बीमारियों की वजह

 

नींद हमारे जीवन का अहम हिस्सा है। एक अच्छी नींद न केवल शरीर को आराम देती है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाती है। हालांकि, जितनी जरूरत है उससे ज्यादा नींद लेना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। अगर आप रोज़ाना 9 घंटे या उससे अधिक सोते हैं और फिर भी थकान महसूस करते हैं, तो यह किसी गहरी समस्या का संकेत हो सकता है। एक्सपर्ट की मानें तो जरूरत से ज्यादा नींद कई गंभीर बीमारियों को न्योता दे सकती है।

ज्यादा नींद यानी हाइपरसोम्निया (Hypersomnia) की स्थिति तब होती है जब कोई व्यक्ति दिन में बार-बार सोता है, फिर भी उसे तरोताज़ा महसूस नहीं होता। यह समस्या न केवल आपकी कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि दिल, दिमाग और वजन जैसी समस्याओं का कारण भी बन सकती है।

1. दिल की बीमारी का खतरा

शोध में पाया गया है कि जो लोग 9 घंटे से ज्यादा सोते हैं, उन्हें हृदय रोग या स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। अत्यधिक नींद हृदय गति, ब्लड प्रेशर और रक्त संचार को प्रभावित करती है।

2. मोटापा बढ़ने की आशंका

ज्यादा सोने वालों में शारीरिक गतिविधि की कमी रहती है, जिससे मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है और वजन तेजी से बढ़ सकता है। मोटापा कई अन्य बीमारियों जैसे डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर को भी जन्म देता है।

3. डायबिटीज का खतरा

ज्यादा नींद लेने से इंसुलिन की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है, खासकर उन लोगों में जो पहले से वजन या ब्लड शुगर से परेशान हैं।

4. मानसिक स्वास्थ्य पर असर

हद से ज्यादा नींद डिप्रेशन और एंग्जायटी का लक्षण हो सकता है। यह नकारात्मक विचारों और अकेलेपन की भावना को बढ़ाता है। लंबे समय तक ऐसा बना रहने से आत्म-विश्वास और प्रेरणा में भी गिरावट आ सकती है

5. थायरॉयड या हार्मोनल असंतुलन

लगातार अत्यधिक नींद शरीर में हार्मोन के संतुलन को बिगाड़ सकती है। विशेष रूप से थायरॉयड या अन्य एंडोक्राइन समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है।

ज्यादा नींद से बचने के लिए क्या करें?

  • रोज एक तय समय पर सोना और जागना शुरू करें।
  • दिनभर सक्रिय रहने की कोशिश करें। हल्की एक्सरसाइज या वॉक जरूर करें।
  • दिन में झपकी लेने से बचें।
  • देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप इस्तेमाल न करें।
  • अगर थकावट के साथ अत्यधिक नींद बनी रहे, तो डॉक्टर से सलाह लें।

 

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आपका बैंक अकाउंट खाली हो सकता है?

 

बिना किसी ओटीपी, पिन या यूपीआई ट्रांजैक्शन के भी आपका बैंक अकाउंट खाली हो सकता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र से सामने आए आधार-इनेबल्ड पेमेंट सिस्टम (AePS) फ्रॉड के मामलों ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। इन मामलों में साइबर अपराधियों ने सिलिकॉन की मदद से लोगों के फिंगरप्रिंट्स की हूबहू कॉपी बनाई और बिना किसी जानकारी के उनके खातों से पैसे निकाल लिए।

इस खतरे से बचने के लिए UIDAI ने बायोमेट्रिक्स को लॉक करने की सुविधा दी है। आइए जानते हैं आप अपने आधार को कैसे सुरक्षित बना सकते हैं।  बायोमेट्रिक्स लॉक करना क्यों है 'सुरक्षा कवच'? जब आप अपने बायोमेट्रिक्स को लॉक कर देते हैं, तो कोई भी व्यक्ति आपके फिंगरप्रिंट या आइरिस (आंखों की पुतली) के स्कैन का इस्तेमाल करके आधार ऑथेंटिकेशन नहीं कर पाएगा। यह AePS के जरिए होने वाली अवैध निकासी को पूरी तरह से रोक देता है।

आधार बायोमेट्रिक्स लॉक करने के आसान स्टेप्स आप घर बैठे UIDAI की वेबसाइट या mAadhaar ऐप के जरिए इसे इनेबल कर सकते हैं:  वेबसाइट के माध्यम से  विजिट करें: UIDAI वेबसाइट या नए Aadhaar एप पर जाएं। विकल्प चुनें: 'My Aadhaar' टैब के अंदर 'Lock/Unlock Biometrics' पर क्लिक करें। लॉगिन: अपना 12 अंकों का आधार नंबर और कैप्चा कोड भरें। सत्यापन: आपके रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर आए OTP को दर्ज करें। एक्टिवेट: 'Enable Locking Feature' पर क्लिक करें। अब आपका बायोमेट्रिक्स पूरी तरह सुरक्षित है। नोट: जब भी आपको सिम कार्ड खरीदने या बैंक केवाईसी के लिए अंगूठा लगाने की जरूरत हो, तो आप इसी प्रक्रिया से इसे 'अनलॉक' कर सकते हैं। काम होने के बाद यह स्वतः फिर से लॉक हो जाता है।

वर्चुअल आईडी (VID): पहचान छिपाने का स्मार्ट तरीका अगर आप किसी एजेंसी को अपना असली आधार नंबर नहीं देना चाहते, तो आप वर्चुअल आईडी (VID) का उपयोग कर सकते हैं। यह 16 अंकों का एक अस्थायी नंबर होता है।  VID जनरेट करने का तरीका  UIDAI के 'VID Generator' लिंक पर जाएं। आधार नंबर और ओटीपी दर्ज करें। 'Generate VID' विकल्प को चुनें। आपके मोबाइल पर 16 अंकों की वर्चुअल आईडी एसएमएस के जरिए भेज दी जाएगी। इसका इस्तेमाल आप e-KYC के लिए कर सकते हैं।  डिजिटल दौर में सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है। अपने आधार बायोमेट्रिक्स को आज ही लॉक करें ताकि आपकी मेहनत की कमाई साइबर ठगों की पहुंच से बाहर रहे।


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चाय पर मंडराता ये ख़तरा


भारत सहित दक्षिण एशिया के कई देशों में परिवार और दोस्तों के साथ बातचीत में चाय एक अहम हिस्सा है.

 भारत सहित दक्षिण एशिया के कई देशों में परिवार और दोस्तों के साथ बातचीत में चाय एक अहम हिस्सा है.  आपने शायद देखा होगा कि अब जापानी चाय माचा दुनिया भर में तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है. लेकिन जलवायु परिवर्तन का असर इसकी फसल पर साफ़ दिखाई दे रहा है.  जापानी उत्पादों के निर्यात पर अमेरिका की ओर से थोपे गए टैरिफ़ से इनकी कीमत आसमान छूने लगी है.  दुनिया के कई देशों में चाय लोकप्रिय है और लगभग सभी जगह चाय उगाने वाले किसानों को जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. दुनिया-जहान में यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या विश्व में चाय उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं?

अमेरिका स्थित 'ग्लोबल टी इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ़ टी कल्चर' संस्था की संस्थापक निदेशक कैथरिन बर्नेट कहती हैं कि अब चाय विश्व भर की संस्कृति का हिस्सा है.  "अब चाय भारत, जापान, स्कॉटलैंड, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी उगाई जाती है. दुनिया में अनेक प्रकार के लोग चाय पसंद करते हैं."  चाय की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पानी के बाद यह सबसे अधिक पिया जाने वाला पेय है.

यह कॉफ़ी, वाइन, बीयर और दूसरी शराबों से भी अधिक पी जाती है. तो सवाल उठता है कि चाय में ऐसी क्या ख़ास बात हैकैथरिन बर्नेट कहती हैं कि दुनिया भर में चाय लोगों को साथ लाने वाले रिवाजों का हिस्सा है, लेकिन चाय के पौधे का इतिहास कई सदियों पहले चीन में शुरू हुआ था.  पहले वहां चाय के पौधों को सुखा कर पाउडर बना कर पानी में डाल कर कटोरी में परोसा जाता था.  कैथरिन बर्नेट कैलिफ़ोर्निया डेविस यूनिवर्सिटी में कला इतिहास की प्रोफ़ेसर भी हैं और चीनी संस्कृति की विशेषज्ञ हैं.  वो बताती हैं कि चौदहवीं शताब्दी में मिंग राजवंश के शासन के दौरान चाय के सेवन में बदलाव आया.  चाय का पाउडर पानी में मिलाए जाने के बजाय अब चाय के पत्तों को खौलते हुए पानी में डाल कर परोसा जाने लगा.  कैथरिन बर्नेट ने बताया कि मिंग राजवंश के दौरान चाय की केतली छोटी होने लगी.  आठ इंच की केतली के बजाय अब छोटी दो या तीन इंच की केतली में चाय बनाई जाने लगी. चाय की केतली का आकार और उसके ढक्कन भी बदलने लगे.

सत्रहवीं सदी के आते-आते चाय की लज़्ज़त एशिया से यूरोप तक पहुंच चुकी थी.  शुरुआत में पुर्तगाली और डच व्यापारियों ने यूरोप में चाय व्यापार शुरू किया. सत्रहवीं सदी के मध्य में चाय ब्रिटेन पहुंची.  चाय की बढ़ती मांग और व्यापार की वजह से कुछ युद्ध भी हुए. अमेरिकी क्रांति की शुरुआत में बोस्टन की टी पार्टी की घटना के बारे में आपको पता होगा-जब अमेरिकी उपनिवेशकों ने ग्रीन टी के 342 बक्से बोस्टन बंदरगाह में पानी में फेंक दिए थे.  कैथरिन बर्नेट के अनुसार, अमेरिका में ग्रीन टी के सेवन का चलन बीसवीं सदी की शुरुआत तक जारी रहा जिसके बाद लोगों ने काली चाय पीना शुरू कर दिया.  लेकिन यूरोप में चाय की बढ़ती लोकप्रियता से व्यापारिक संतुलन भी बिगड़ने लगा. ब्रिटेन इस खरीद के बदले बड़ी मात्रा में चांदी और धन चीन भेजने लगा और बदले में उसे चाय के अलावा वहां से कुछ और नहीं मिल रहा था.  इसलिए ब्रिटेन ने चीन से कुछ और ऐंठने की तरकीब ढूंढना शुरू कर दिया.  ब्रिटेन ने भारत से चीन में अफ़ीम सप्लाई करना शुरू कर दिया. चीनी आबादी में अफ़ीम की बढ़ती लत से चिंतित होकर चीन ने कार्रवाई शुरू की जिसके चलते उन्नीसवीं सदी के मध्य में ओपियम वॉर या अफ़ीम युद्ध हुए.  19वीं सदी के मध्य में चाय उद्योग पर चीन के एकाधिकार का अंत हो गया. ब्रिटेन ने चाय के पौधे भारत में ला कर वहां चाय की खेती शुरू कर दी.  इसी के साथ चाय उत्पादन की प्रक्रिया में भी बदलाव आने शुरू हो गए.

 चाय उगाने वाले किसानों के सामने कितनी मुश्किलें?

कनाडा स्थित इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फ़ॉर द सस्टेनेबल डेवेलपमेंट में कृषि एवं खाद्य कार्यक्रम विभाग की निदेशक क्रिस्टीना लारिया बताती हैं कि दुनिया में कई प्रकार की चाय बनती हैं.  मिसाल के तौर पर काली चाय, ग्रीन टी या हरी चाय, हर्बल चाय, फ़्लोरल टी, मगर यह सब हरी चाय से ही बनाई जाती हैं.  उन्होंने कहा कि सफ़ेद चाय को बहुत कम प्रोसेस किया जाता है इसलिए उसका ऑक्‍सीडाइज़ेशन कम होता है और ज़ायका हल्का होता है.  कई लोग इसे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि इसमें एंटी ऑक्सीडेंट तत्व अधिक होते हैं. हरी चाय के पत्तों को ऑक्सीडाइज़ करने से काली चाय बनती है.  काली चाय पूरी तरह से ऑक्सीडाइज़्ड होती है. काली चाय में दूसरे तत्व और फ़्लेवर मिला कर हर्बल टी और फ़्लोरल टी बनाई जाती है.  उन्नीसवीं सदी के मध्य में भारत में चाय उगाने की शुरुआत हुई. उसके बाद इसे अफ़्रीका में भी उगाया जाने लगा.  1891 में मलावी में व्यावसायिक स्तर पर चाय के बागान शुरू किए गए. उसके बाद बीसवीं सदी की शुरुआत में कीनिया और दक्षिण अफ़्रीका में चाय की खेती शुरू हुई.  आज चीन में तीस लाख हेक्टेयर ज़मीन पर चाय उगाई जाती है जबकि भारत में केवल पांच लाख हेक्टेयर भूमि पर चाय बागान हैं.  क्रिस्टीना लारिया का कहना है, "विश्व में चीन और भारत चाय के सबसे बड़े उत्पादक हैं उसके बाद नंबर आता है कीनिया का.  कुल चाय उत्पादन के चालीस प्रतिशत हिस्से की खपत केवल एशिया में होती है. यहां चाय उत्पादन महत्वपूर्ण है क्योंकि सबसे ज्यादा चाय उगाने वाले देशों में चाय की खपत भी सबसे ज्यादा है."  दुनिया भर में लगभग एक करोड़ तीस लाख लोग चाय उद्योग में काम करते हैं. इसमें अधिकतर श्रमिक महिलाएं हैं.  क्रिस्टीना लारिया बताती हैं कि इसका एक कारण यह है कि चाय बागानों में मज़दूरी करने वाली महिलाएं चाय के पत्ते तोड़ने के लिए अपने बच्चों को भी बागानों में साथ ले जाती हैं.  चाय छोटे किसानों द्वारा ज़रूर उगाई जाती है लेकिन इसकी प्रोसेसिंग केवल तीन प्रमुख केंद्रों में होती है- भारत में कोलकाता, श्रीलंका में कोलंबो और कीनिया के मोमबासा शहर में.  क्रिस्टीना लारिया ने कहा कि दुनिया की 75 प्रतिशत चाय नीलामी के ज़रिए बेची जाती है. यानी चाय बागानों से चाय इन प्रमुख केंद्रों में लाई जाती है जहां उसे प्रोसेस और पैकेजिंग करके बेची जाती है.  यानी इसकी बिक्री में चाय उगाने वालों की कोई भूमिका नहीं होती और अधिकांश मुनाफ़ा चाय प्रोसेस करने और बेचने वाली कंपनियां कमाती हैं और किसानों के हाथ में इसका बहुत छोटा हिस्सा आता है.  मगर क्या लोग यह बात जानते हैं कि चाय उगाने वाले किसान इसे कैसे और कितनी मुश्किल से उगाते हैंइस पर क्रिस्टीना लारिया का जवाब था, "मुझे नहीं लगता कि यूरोप और उत्तर अमेरिकी देशों में जहां चाय लोकप्रिय है, वहां लोग चाय उत्पादक किसानों या उनकी स्थितियों के बारे में ख़ास जानते हैं. इस बारे में लोगों में अधिक जागरूकता लाने की आवश्यकता है ताकि इस बात पर बल दिया जा सके कि चाय उगाने वालों को भी मुनाफ़े का उचित हिस्सा मिले और चाय उद्योग फले-फूले."  मगर अधिकांश ग्राहक यह ज़रूर जानते हैं कि चाय की कीमतें बढ़ गई . जिसकी वजह साफ़ है

चाय की खेती पर जलवायु परिवर्तन का असर

भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में तेज़ ज़ायके वाली कड़क चाय उगाई जाती है जबकि दार्जिलिंग में हल्के ज़ायके वाली चाय उगती है.  वहीं कर्नाटक और केरल में उगाई जाने वाली चाय का अपना अलग स्वाद होता है.  चाय के पौधे सर्दी के मौसम में लगाए जाते हैं. मानसून की बारिश भी इनके लिए महत्वपूर्ण होती है. लेकिन मौसम के बदलावों से मानसून के आगमन में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है.  भारत स्थित रेनफ़ॉरेस्ट अलायंस के कंसल्टिंग प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर और भारत के चाय उद्योग के विशेषज्ञ हार्की सिद्धू बताते हैं कि उनका काम चाय किसानों की जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करना है.  उन्होंने कहा, "वर्षा वन क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से कई समस्याएं खड़ी हो रही हैं. बाढ़ आने लगी है. पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं. इससे चाय की फसल पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है."  वो कहते हैं, "केवल चाय की फसल ही बर्बाद नहीं हो रही बल्कि झाड़ियों को भी नुकसान पहुंच रहा है जिसका चाय उत्पादन पर असर पड़ रहा है.''  वो कहते हैं कि अगर मिट्टी स्वस्थ रहे तो पौधे भी अच्छी तरह उगेंगे और बीमारियों से बेहतर तरीके से लड़ पाएंगे. जब सूखा पड़ता है तो मिट्टी भुरभुरी हो जाती है और जब ज्यादा बारिश होती है तो ज़मीन की सबसे ऊपरी उपजाऊ सतह बह जाती है जिससे पौधों के लिए ज़रूरी पौष्टिक तत्व पानी में बह जाते हैं.  पहले बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं कभी-कभार होती थीं लेकिन अब अक्सर होने लगी हैं."

 

तो बाढ़ के बाद किसानों को क्या करना पड़ता हैहार्की सिद्धू कहते हैं कि बाढ़ के बाद खेती की ज़मीन में गाद भर जाती है. अगर गाद को हटाया नहीं जाए तो पौधों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलेगा और वह बड़े नहीं हो पाएंगे.  वो कहते हैं अगर तापमान 23 डिग्री से ऊपर चला जाए तो चाय के पौधों को नुकसान पहुंच सकता है, वहीं अगर तापमान शून्य से नीचे चला जाए तो भी समस्या खड़ी हो जाती है.  हार्की सिद्धू के अनुसार, मौसम में बड़े उतार-चढ़ाव से मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं. मौसम में अब बड़े बदलाव आने लगे हैं.  मिसाल के तौर पर पांच दिन मूसलाधार बारिश होती है और उसके बाद लगभग पच्चीस दिनों तक तेज़ गर्मी पड़ती है.  जब इस प्रकार की स्थितियां उत्पन्न हो जाएं तो पौधों को बहुत नुकसान पहुंचता है और किसानों की फ़सल प्रभावित होती है.  मौसम के अनपेक्षित बदलावों का असर फ़सल को फ़ैक्ट्रियों तक पहुंचाने पर भी पड़ता है.  हार्की सिद्धू ने बताया कि चाय के पत्ते बहुत जल्दी सड़ जाते हैं. पौधों से तोड़ने के 8–10 घंटे के भीतर उन्हें प्रोसेसिंग के लिए फ़ैक्ट्री में पहुंचाना ज़रूरी होता है.  अगर मौसम की वजह से यातायात बाधित हो जाए और समय रहते फ़सल फ़ैक्ट्री तक न पहुंचे तो वह बेकार हो जाती हैं और चाय बनाने लायक नहीं रहती.  और एक बार चाय बनकर तैयार हो जाए तो उसे जल्द से जल्द बाज़ार में पहुंचाना ज़रूरी है क्योंकि उसके बाद ही किसानों को पैसे मिलते हैं. यह एक बड़ी समस्या है.

 सिर्फ़ भारत के चाय उत्पादकों पर ही ये संकट नहीं

जलवायु परिवर्तन की मार केवल भारत के चाय उत्पादकों पर ही नहीं पड़ रही बल्कि अन्य जगह भी किसान इस समस्या से जूझ रहे हैं.  लेकिन एक अन्य चाय उत्पादक देश इस चुनौती से निपटने के लिए नए तरीके और टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल कर रहा है.  रवांडा स्थित एथिकल टी पार्टनरशिप के उपप्रमुख लिबरल सेबूरीकोको कीनिया के चाय के बागानों का अध्ययन करते हैं. वहां काम करते रहे हैं. वो बताते हैं कि किसान जलवायु परिवर्तन की चुनौती से कैसे निपट रहे हैं.  उन्होंने कहा कि चाय के पौधों को निरंतर बारिश और सौम्य तापमान की आवश्यकता होती है मगर इन दोनों में ही बदलाव आ रहा है.  अगर कीनिया की बात की जाए तो वहां कई बार अनपेक्षित तरीके से मौसम बदलता है. कभी गर्मी होती है और कभी बारिश की कमी, जिसकी वजह से चाय की पत्ती का स्वाद प्रभावित होता है. इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं छोटे किसान जो कीनिया की कुल चाय का लगभग पचास प्रतिशत उत्पादन करते हैं.  वो कहते हैं, "उनके लिए जलवायु परिवर्तन एक कड़वी सच्चाई है. उनके लिए फ़सल अच्छी होगी या नहीं यह मौसम पर निर्भर करता है."  किसानों के लिए इस समस्या से निपटने का आसान विकल्प यह है कि ऊंची जगहों पर जाकर चाय की खेती की जाए.  लिबरल सेबूरीकोको ने कहा कि कीनिया में समुद्र स्तर से पंद्रह सौ से सोलह सौ मीटर की ऊंचाई पर चाय की खेती आसानी से होती थी, लेकिन अब किसानों को इससे कहीं अधिक ऊंची जगहों पर खेती करनी पड़ रही है.  जलवायु परिवर्तन की वजह से लगभग 40 प्रतिशत ज़मीन चाय की खेती के अनुकूल नहीं रही है. विश्व भर में अब चाय की ज़मीन का नक़्शा बदल रहा है.  इसी साल सूखे या बेमौसम बारिश की वजह से कीनिया में बड़ी मात्रा में चाय की फ़सल बर्बाद हो गई. यह नुकसान कितना बड़ा था इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं बर्बाद फ़सल रवांडा के कुल चाय उत्पादन के बराबर थी.  

समस्या की असली जड़

लेकिन अब इस समस्या से निपटने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया जाने लगा है. लिबरल सेबूरीकोको ने कहा कि ड्रोन की मदद से दूरस्थ और विशाल क्षेत्रों की हाई रेज़ोल्यूशन तस्वीरें खींचकर पता लगाया जा सकता है कि कहाँ फ़सल में कीड़े लग रहे हैं और कहाँ आर्द्रता कम हो रही है.  यह काम कई सहकारी संस्थाएं करती हैं और वो यह जानकारी फ़ोन मैसेज के ज़रिए किसानों तक पहुंचाती हैं.  मौसम विभाग द्वारा दी जाने वाली जानकारी में भी काफ़ी सुधार आया है और इसे प्राप्त करने के लिए किसानों को बस एक सामान्य फ़ोन की ज़रूरत होती है जिसके आधार पर वो जल्द कदम उठा सकते हैं.  इन समस्याओं के मद्देनज़र क्या दुनिया के दूसरे हिस्सों में चाय उगाना अधिक आसान नहीं होगालिबरल सेबूरीकोको कहते हैं, "जलवायु परिवर्तन के चलते अब चाय की खेती के लिए नयी ज़मीन तैयार करने का समय आ चुका है. एक समय माना जाता था कि यूके का मौसम चाय की खेती के लिहाज़ से बहुत ज्यादा ठंडा है. लेकिन अब कॉर्नवाल और स्कॉटलैंड में कई चाय बागानों में चाय उगाई जाने लगी है. हालांकि यह अभी बहुत छोटे स्तर पर हो रहा है. वहीं कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि चाय चांद पर भी उगाई जा सकती है. यानी चाय की खेती के लिए नयी ज़मीन के विकल्प ढूंढे जा रहे हैं."  तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की तरफ-क्या विश्व में चाय उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे हैंचाय के अलग-अलग फ़्लेवर दुनिया में लोकप्रिय हो रहे हैं. जापान की माचा चाय इसका अच्छा उदाहरण है.  चाय की मांग तो बढ़ रही है लेकिन समस्या सप्लाई की है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के चलते किसानों के लिए चाय का पर्याप्त उत्पादन करना मुश्किल हो रहा है.  राजनीतिक कारणों और बढ़ती मांग के चलते चाय की कीमतें भी बढ़ गई हैं मगर दुर्भाग्यवश इसका फ़ायदा चाय उगाने वाले किसानों को सबसे कम हो रहा है, जिस बारे में अधिक जागरूकता की आवश्यकता है. 

 बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

साभार-देशबंधु 

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शनिवार, 20 सितंबर 2025

अपने सुनहरे सपने

 कुर्बान कर देता है एक बाप 

अपने जीवन के सबसे शानदार दिन 

और अपने सुनहरे सपने भी 

अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए 

एक कर देता है वह दिन और रात 

लगा देता है अपना पूरा दम और ख़म 

कि अपने बच्चों को दे सकूँ वह सब सुविधाएं 

जिसके लिए कभी तरसता था मैं मन ही मन 

किसी दिन बाजार से गुजरते हुए अचानक 

हलवाई की दुकान देखकर 

वह टटोलता है अपनी जेब 

और ज्यादा गुंजाईश न होते हुए भी 

खरीद ही लेता है एक पाव जलेबी 

और कुछ समोसे भी चटनियों के साथ 

फिर कुछ गुनगुनाते हुए 

बढ़ जाता है अपने घर की ओर

जहाँ इन्तजार कर रहे होते हैं  कुछ अपने लोग 

खुश होते हैं बाप के हाथ में जलेबी और समोसा देखकर 

बच्चे भी और उनकी माँ भी जरा सा मुस्कुरा देती है 

सबको खुश देखकर खुश होता है वह भी 

अपनी इस छोटी सी सफलता पर 

हालंकि उसे पता होता है कि यह तो बहुत ही 

छोटी सी सफलता है जीवन की कठिन राह पर 

अभी तो सामने आएंगी पहाड़ सी चुनौतियाँ 

जिनके बारे में सोचकर काँप जाता है उसका मन 

मगर भविष्य की उन चुनौतियों से अपने बच्चों को 

बचाने के लिए ही तो करता है वह हाड़तोड़ मेहनत 

कई बार खूब थके होने के बाद भी 

ठीक से सो नहीं पाता वह कई-कई रातें 

इसी चिंता में कि अगर खरा न उतर पाया वह  

अपने बच्चों की उम्मीदों पर तो फिर क्या होगा...

                                            कृष्णधर शर्मा  19/9/2025 


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शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

बैंक का लोन

 बैंक ने मेरा लोन पास कर दिया है

किसान ने जब घर पहुंचकर यह खुशखबरी सबको सुनाई तो सब घरवाले ख़ुशी से झूम उठे. पिछले वर्ष सूखे की मार से फसल ख़राब हो गई थी जिससे किसान की सारी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई थी. खाने तक के लिए अनाज कम पड़ गया था फिर बेचने की बात कौन करे. यहाँ तक कि अगले वर्ष की खेती के लिए वह बीज भी बचाकर नहीं रख पाया था. मानसून नजदीक था मगर खेत के पेपर गिरवी रखने की बात पर भी बैंकवाले लोन देने के लिए आना-कानी कर रहे थे तभी किसान के एक रिश्तेदार ने समझाया अरे लोन ऐसे ही नहीं मिल जायेगा. बैंकवाले बाबू को खुश करोगे तब जाकर तुम्हारा लोन पास होगा.

किसान बहुत ही सीधा-सादा और सज्जन आदमी था. वह बड़े ही भोलेपन से रिश्तेदार का मुंह देखने लगा तो रिश्तेदार ने कहा अरे भाई उसे कुछ रुपया देना पड़ेगा, रिश्वत खिलानी पड़ेगी समझे क्या!

पहले तो किसान ने रिश्तेदार की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया मगर जब मानसून की आहट सुनाई पड़ने लगी तो वह बेचैन हो उठा और अपनी औरत के पास जाकर बोला “अब क्या करें! बरसात भी समझो आ ही गई है और अभी तक खाद-बीज का कोई इंतजाम नहीं हो पाया है. बैंकवाला बाबू बिना कुछ लिए-दिए लोन नहीं पास करेगा.”

किसान की औरत ने अपने गले में पहना मंगलसूत्र निकालकर देते हुए कहा “इसे ले जाओ और कहीं गिरवी रखकर उस बाबू को रुपया दो ताकि लोन के रूपये से हमारी भरभराती हुई गृहस्थी को सम्हाला जा सके. अच्छी खेती होने के बाद हम बैंक का लोन भी जमा कर सकेंगे और मेरा मंगलसूत्र भी वापस आ जायेगा.”

किसान के दो बच्चे थे. बड़ी बेटी थी जिसका विवाह वह पांच साल पहले ही ग्राम प्रधान से कर्ज लेकर पड़ोस के ही गाँव में कर चुका था और पिछले वर्ष ही कर्जमुक्त हुआ था उससे  छोटा बेटा था जो बारहवीं फेल होकर दो साल से घर पर ही बैठा था मगर उसके सपने बड़े-बड़े थे. वह गाँव की ही एक लड़की से शादी करना चाहता था मगर लड़की उससे संपन्न घर की होने की वजह से और बारहवीं में फेल होकर घर में खाली बैठे रहने की कारण उससे कतराती थी. एक बार मेले में मिलने पर उसने अपनी सहेलियों के सामने लड़के से कह भी दिया था कि “शादी तो मैं तुमसे कर भी लूं मगर न तो तुम्हारे पास पक्का मकान है न घर में टीवी है और बाजार घूमने क्या मैं तुम्हारे साथ साईकल में जाऊँगी! अरे पहले इन सबका इंतजाम कर लो फिर शादी के बारे में सोचना.’’

  बदलते समय के साथ किसान के बेटे को भी आधुनिक ज़माने के साथ कदमताल करने का मन होता था मगर घरेलू अभाव व् परेशानियाँ उसके सपनों के आड़े आ जाते थे. माँ के डांटने-कहने पर बेमन से कभी-कभार पिता का छोटे-मोटे कामों में हाथ बंटाता था मगर उसका मन भटकता ही रहता था.

 आख़िरकार किसान ने बेमन से अपनी पत्नी का मंगलसूत्र गिरवी रखकर बैंक के बाबू को पांच हजार रूपये की रिश्वत दी तब जाकर उसका पचास हजार का लोन पास हुआ.

किसान ने लोन के रूपये से खेत की बढ़िया से जुताई करवाई और बाजार से बढ़िया खाद-बीज लाकर बुवाई कर दी. इस सबके बाद लोन के कुछ रूपये बच जाने से वह पत्नी का मंगलसूत्र छुड़वाना चाहता था मगर घर में भी राशन-पानी के लिए कोई व्यवस्था न थी अतः किसान की पत्नी ने ही रास्ता निकाला कि अभी कुछ दिन तक मंगलसूत्र और गिरवी रहने दो. फसल कटाई के बाद उसे ब्याज सहित रूपये देकर मुक्त करवा लेना. अब किसान को अगले 2-3 महीने राशन-पानी की भी कोई चिंता न थी और निराई-गोड़ाई, जंगली जानवरों से फसल की रखवाली करते कब फसल काटने का समय आया किसान को पता न चला. इस साल पूरे राज्य में सबकी फसल अच्छी हुई थी.   

किसान भी अपने खलिहान में अनाज का ढेर देखकर बहुत खुश था कि अब वह बैंक का लोन चुकाकर और अपनी पत्नी का मंगलसूत्र भी महाजन के यहाँ से छुडवा लेगा.

किसान ने खलिहान से सबसे पहले अगले साल की खेती के लिए बीज निकाला फिर सालभर के खाने के लिए अनाज अलग किया और बाकी अनाज गाँव के ही प्रधान के ट्रैक्टर में लोड करवाकर अन्य कई किसानों के साथ सहकारी समिति की तरफ निकल पड़ा. इस साल बम्पर पैदावार होने की वजह से फसल बेचने के लिए समितियों में ट्रैक्टरों की लम्बी कतार लगी थी. तीसरे दिन किसान का भी नंबर आया तो उसने भी अपनी फसल समिति के कांटे पर तुलवाई. उसकी फसल का दाम कुल मिलाकर पचपन हजार रूपये हुआ था. किसान ने हिसाब लगाया कि इससे वह बैंक का लोन भी दे सकेगा और पत्नी का मंगलसूत्र भी छुडवा सकेगा. अपनी फसल की कमाई लेकर वह शाम होते-होते घर पहुंचा और गमछे से पसीना पोछते हुए पत्नी से पानी माँगा. पत्नी भी उसकी आवाज सुनकर पानी लिए हुए आँगन में भागी चली आई. किसान का बेटा भी पिता को घर आते देख खेल के मैदान से भागता हुआ घर आ पहुंचा. किसान ने फसल बेचकर लाई हुई रकम सबके सामने रख दी और कहा कि “चलो फसल की कीमत ज्यादा तो नहीं मिली मगर बैंक का लोन जमा कर दूंगा तो एक बड़ी चिंता से मुक्ति मिल जाएगी. बाकी व्यवस्थाएं अगली फसल में देखी जायेंगी.”

इधर किसान और उसकी पत्नी कर्जमुक्त हो जाने की संभावना से राहत महसूस कर रहे थे उधर किसान के बेटे के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. वह महीनों से प्लानिंग करके बैठा था अब उसे मूर्त रूप देने का समय आ चुका था. उसने पिता से कहा “पिताजी मैंने पिछले महीने गन्ना मिल में नौकरी के लिए आवेदन दिया था तो वहां मेरी सुपरवाईजर (मुंशी) की नौकरी पक्की हो गई है मगर रोज 6-7 किलोमीटर आने-जाने में काफी समय बर्बाद होगा और कई बार मैं समय से पहुँच भी नहीं पाउँगा! तो मैं सोच रहा था क्यों न मैं इस रूपये की एक मोटरसाईकिल ले लूँ! बैंक का कर्ज मैं अपनी तनख्वाह से चुका दूंगा!

“मगर मुंशी की नौकरी में तुम्हें तनख्वाह ही कितनी मिलेगी बेटा कि तुम कर्ज चुका पाओगे!’

पिता के चेहरे पर उभरे परेशानी के भाव को देखते हुए बेटे ने कहा “पिताजी, वहां पर तनख्वाह के अलावा उपरी कमाई भी हो जाती है. अतः कर्ज चुकाने में कोई परेशानी नही आएगी. अब पिताजी को तुम ही समझाओ न माँ!”  

पहले तो माँ भी पशोपेश में पड़ गई मगर बेटे के दबाव बनाने पर उसने भी कहा “अब इतना कह रहा है तो दे दीजिये न रूपये! आपको कर्ज चुकाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी. फिर हमारे बेटे ने इतने दिनों के बाद नौकरी करने की बात कही है जिससे हमें भी खुश होना चाहिए और उसका सहयोग करना चाहिए.”

किसान माँ-बेटे की बातें सुनकर अब मना न कर पाया और रूपये बेटे के हाथों में सौपते हुए बोला “यह लो बेटा रूपये, मन लगाकर काम करना. हमें इसी महीने से बैंक का लोन चुकाने के लिए बचत भी करनी होगी. हाँ एक बात और है बेटा! ऐसा कुछ भी मत करना जिससे हमारी सामजिक प्रतिष्ठा पर कोई आंच आये.”

“आप बिलकुल भी चिंता न करें पिताजी! मैं भी अब समझदार हो गया हूँ और अपनी जिम्मेवारी समझता हूँ.”

“ठीक है बेटा जैसा तुमको उचित लगे”

बेटे ने रूपये मिलते ही अगले दिन एक पुरानी मोटरसाइकिल और एक टीवी खरीद ली. माँ-बाप ने जब टीवी खरीदने पर आपत्ति जताई तो बेटे ने कहा “माँ! आजकल जमाना बदल रहा है और हमें भी नए ज़माने के हिसाब से चलना होगा नहीं तो हम पीछे रहा जायेंगे. जरा सोचो तो टीवी पर इतने अच्छे कार्यक्रम आते हैं, धार्मिक सीरियल और क्रिकेट का खेल भी आता है. पहले जब मैं किसी और के घर टीवी देखने जाता था तो कई बार मुझे अपमानित होना पड़ता था अब हम सब अपने कामों से फुर्सत होकर साथ बैठकर टीवी देख पाएंगे तो कितना अच्चा महसूस होगा न! और फिर पड़ोसियों और गांववालों में भी हमारी कितनी इज्जत बढ़ेगी न!”

माँ-बाप इस बार भी बेटे के तर्कों के आगे निरुत्तर रह गए. अब बेटा मोटरसाइकिल लेकर लड़की के घर की तरफ निकला जहाँ घर के सामने बने चबूतरे पर ही लड़की एक सहेली से बातें करते हुए दिख गई. लड़के ने आगे-पीछे देखकर मोटरसाइकिल रोकी और लड़की को मोटरसाइकिल और नई टीवी खरीदने के बारे में बताया. मगर लड़की के चेहरे पर ख़ुशी के भाव न देखकर लड़का घबराया और उससे पूछा “तुम खुश नहीं हो क्या! अब तो हमारी शादी में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए न!” लड़की ने थोडा कठोर नजरों से देखते हुए कहा “तुम्हारे टीवी और मोटरसाइकिल खरीद लेने से हमारी शादी नहीं हो जाने वाली! मुझे अपने खंडहर जैसे दिखनेवाले मिटटी के कच्चे मकान में रखोगे क्या जिसमें कूलर तक नहीं है! और तुम ठहरे बेरोजगार और निठल्ले आदमी! मेरी जरूरतें और खर्च कैसे पूरा करोगे! जाओ पहले इस सबके बारे में सोचो फिर शादी की सोचना!” कहकर लड़की अपनी सहेली के साथ बातें करने लगी. लड़के को यह सब सुनकर बहुत दुःख हुआ और वह घर आकर टीवी चलाकर बिस्तर पर पड़ गया.

  जब कई दिनों तक बेटा दिनभर सिर्फ टीवी देखकर और सुबह-शाम मोटरसाइकिल लेकर घूमता रहा तो माँ-बाप का माथा ठनका और उन्होंने बेटे से कहा कि “बेटा! तुम 3-4 दिन से घर पर ही बैठे हो! नौकरी करने क्यों नहीं जा रहे हो?”

बेटे की भी अचानक जैसे नींद खुली हो. वह थोडा सिटपिटाया मगर बातें बनाते हुए बोला “अरे! आप लोग तो बेकार ही सोचकर परेशान हो रहे हैं मुझे दो दिन के बाद परसों के दिन  नौकरी पर आने को कहा गया है इसलिए मैं कहीं न जाकर घर पर ही आराम कर रहा था”

बेटे की बातें सुनकर माँ-बाप को कुछ तसल्ली हुई. लड़के ने भी सोचा कि अब टालमटोल करने से काम नहीं चलेगा. मुझे कुछ काम करना ही पड़ेगा तभी घर-गृहस्थी भी चलेगी और कुछ कमाकर पक्का घर बनाऊंगा तब जाकर मेरी शादी की बात भी बनेगी.

लड़का चिंतित होकर अगले दिन सचमुच काम की तलाश में गन्नामिल के दफ्तर पहुंच गया और वहां के मैनेजर से अपनी नौकरी के लिए निवेदन किया मगर मैनेजर ने उसे साफ़ जवाब दे दिया कि अभी तो वैसे भी हमारे यहाँ आदमी ज्यादा हैं. हमें अभी नए आदमी की कोई जरूरत नहीं है.”  लड़का वहां से निराश होकर और कई जगह काम की तलाश में गया मगर उसे कोई काम नही मिला. अगले दो-तीन दिनों तक कोई व्यवस्था नहीं हो पाने की वजह से उसका आत्मविश्वास चकनाचूर हो चुका था और वह मानसिक रूप से काफी तनावग्रस्त हो गया. अब वह अक्सर घर पर ही अपनी कोठारी में मुंह छुपाकर पड़ा रहता था. माँ-बाप को जब उसकी सच्चाई का पता चला तो उनके पैरों के नीचे से मानों धरती ही खिसक गई. पिता को तो जैसे सदमा सा लगा. वह अब अक्सर अपने खेत पर जाकर बैठे रहते और चुपचाप ही रहते. एक दिन बैंक से लोन वसूली का नोटिस आया जिसे देखकर वह काफी घबरा गया. नोटिस लाने वाले ने उसे बताया कि अगर तुमने जल्दी ही बैंक का लोन ब्याज सहित नहीं चुकाया तो तुम्हारे घर और खेत कुर्क कर लिए जायेंगे. किसान की आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा और वह अपना सर पकड़कर बैठ गया.  शाम को उसने खाना भी नहीं खाया और अनमना सा अपने खेतों की तरफ निकल गया.

रात काफी हो जाने पर भी जब किसान घर नहीं लौटा तो उसकी पत्नी काफी परेशान हो गई और बेटे को बोली “बेटा! देख तो तेरे पिताजी कहाँ हैं! अभी तक घर नहीं आये, उन्होंने आज खाना भी नहीं खाया है और बिना कुछ कहे कहाँ चले गए हैं!”

बेटा इस समय अवसादग्रस्त होकर रात में खाना खाने के बाद नशीली दवाओं का सेवन करने लगा था. वह इस समय भी नशीली दवाओं का सेवन करके अपने कमरे में पड़ा हुआ था. उसने माँ की बातें तो सुनी मगर उसे कुछ खास समझ में नहीं आया. माँ ने काफी देर तक बेटे को उठाना चाहा मगर बेटे की हालत उस समय ऐसी थी कि वह उठकर कुछ दूर भी स्वयं नहीं चल पा रहा था. थककर वह खुद ही किसान को ढूँढने निकल पड़ी. आस-पड़ोस में कई लोगों से पूछने पर पता चला कि किसान को खेतों की तरफ जाते देखा गया था. चांदनी रात के हलके उजाले का सहारा लिए वह खेत की तरफ चल पड़ी. खेत पहुंचकर उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई और किसान को आवाज भी लगे मगर कहीं से कोई जवाब न आया. उसने भी आज उपवास रखने के कारण सुबह से कुछ नहीं खाया था और शाम को किसान के बिना बताये कहीं चले जाने की वजह से वह शाम को भी कुछ नहीं खा पाई. दिनभर की कमजोरी थकान और किसान की चिंता से बेहाल ही थी कि अचानक उसे पास के पेड़ पर कुछ लटकता हुआ सा दिखा. वह घबराकर पेड़ के पास पहुंची तो देखा कि किसान अपने गमछे का फंदा बनाकर पेड़ पर निर्जीव होकर लटक रहा था यह सब देखकर वह बेहोश होकर धम्म से खेत की मेड पर गिर पड़ी. अगली सुबह जब कई लोगों ने घर आकर बेटे को जगाया और उसे लेकर खेत पहुंचे तो बेटे ने देखा कि पिता पेड़ पर लटके हुए हैं और माँ जमीन पर निर्जीव पड़ी हुई है. उसकी आँखों में न आंसू आये और न ही उसने किसी से कुछ कहा. पथरायी आँखों से कभी पिता और कभी माँ को देखता वह भी खेत की मेड पर पड़े माँ के निर्जीव शरीर के पास बैठ गया.   कृष्णधरशर्मा


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